Katha Sangrah Krishna श्रीमद्भागवत महापुराण एवं विष्णु पुराण

भक्त ध्रुव की अमर तपस्या कथा — अटल विश्वास और ध्रुवतारे की प्राप्ति

पांच वर्ष के अबोध बालक ध्रुव का सौतेली मां सुरुचि द्वारा अपमान, मां सुनीति की पावन सीख, मधुवन में कठोर तपस्या, और भगवान नारायण द्वारा अटल ध्रुव लोक का वरदान।

भक्त ध्रुव की अमर तपस्या कथा — अटल विश्वास और ध्रुवतारे की प्राप्ति
Katha Sangrah श्रीमद्भागवत महापुराण एवं विष्णु पुराण
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भक्त ध्रुव की अमर तपस्या कथा

स्वायंभुव मनु के पुत्र राजा उत्तानपाद की दो रानियां थीं—सुनीति और सुरुचि। बड़ी रानी सुनीति शांत, धर्मपरायण और विनीत थीं, जबकि छोटी रानी सुरुचि अत्यंत रूपवती और अभिमानी थीं। राजा उत्तानपाद सुरुचि के प्रति अत्यधिक आसक्त थे। सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव था और सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम था।

एक दिन पांच वर्ष का नन्हा बालक ध्रुव खेलते-खेलते राजसभा में पहुंचा और उसने देखा कि उसका छोटा भाई उत्तम पिता की गोद में बैठा लाड़ लड़ा रहा है। बालक ध्रुव का भी मन हुआ और वह पिता की गोद में चढ़ने लगा। राजा उसे गोद में लेना ही चाहते थे कि सुरुचि ने क्रोधपूर्वक ध्रुव का हाथ पकड़कर खींच लिया और कटु स्वर में कहा—

"अरे मूर्ख! तू राजा की गोद में बैठने का अधिकारी नहीं है। यद्यपि तू राजा का ज्येष्ठ पुत्र है, परंतु तूने मेरी कोख से जन्म नहीं लिया। यदि तुझे राजसिंहासन और पिता की गोद चाहिए, तो वन में जाकर भगवान नारायण की तपस्या कर और वर मांग कि तेरा पुनर्जन्म मेरी कोख से हो!"

राजा उत्तानपाद सुरुचि के भय से मौन रहे। अपमानित और रोता हुआ बालक ध्रुव अपनी मां सुनीति के पास पहुंचा। सुनीति ने बालक को हृदय से लगाकर सांत्वना दी और कहा—"बेटा! तेरी विमाता ने कटु कहा, परंतु सच कहा है। सांसारिक पिता की गोद से कहीं अधिक श्रेष्ठ उस जगत्पिता नारायण की गोद है, जिनकी कृपा से ब्रह्मा जी ने सृष्टि रची। तू उन्हीं जगन्नाथ की शरण में जा, वही तेरे दुखों का निवारण करेंगे।"

माता के वचनों को आदेश मानकर मात्र पांच वर्ष का बालक ध्रुव उसी क्षण राजमहल त्यागकर वन की ओर चल पड़ा। मार्ग में देवर्षि नारद मिले। नारद जी ने बालक की परीक्षा लेते हुए कहा—"बेटा! तू अभी बहुत छोटा है। भूख-प्यास और जंगली हिंसक जीवों से भरा वन तपस्या के योग्य नहीं है। लौट जा।"

किंतु ध्रुव अपने संकल्प पर अडिग रहे। बालक की अटूट निष्ठा देखकर नारद जी ने प्रसन्न होकर उन्हें यमुना तट पर स्थित पावन मधुवन में जाने का निर्देश दिया और द्वादशाक्षर मंत्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' की दीक्षा दी।

ध्रुव ने मधुवन में जाकर कठोर तपस्या प्रारंभ की। पहले महीने में तीन-तीन दिन के अंतराल पर बेर और फल खाए। दूसरे महीने में छह-छह दिन के अंतर पर सूखे पत्ते चबाए। तीसरे महीने में नौ-नौ दिन पर केवल जल पिया। चौथे महीने में बारह-बारह दिन पर केवल वायु का भक्षण किया और एक पैर पर खड़े होकर भगवान का ध्यान किया। पांचवें महीने में उन्होंने अपनी श्वास को भी रोक लिया।

बालक के तपोबल से संपूर्ण ब्रह्मांड कांप उठा। अंततः भक्तों के अधीन भगवान नारायण गरुड़ पर आरूढ़ होकर साक्षात प्रकट हुए। भगवान ने अपने शंख से बालक के कपोलों का स्पर्श किया, जिससे ध्रुव के मुख से वेदतुल्य दिव्य स्तुतियां प्रवाहित होने लगीं।

भगवान ने प्रसन्न होकर कहा—"हे ध्रुव! तेरी निष्काम तपस्या से मैं अत्यंत संतुष्ट हूं। तुझे वह सर्वोच्च स्थान प्रदान करता हूं जिसे आज तक किसी ने प्राप्त नहीं किया। तू छत्तीस हजार वर्षों तक न्यायपूर्वक पृथ्वी का राज्य करेगा और उसके पश्चात आकाश में 'ध्रुव तारा' बनकर अटल रहेगा, जिसके चारों ओर सप्तर्षि और सभी नक्षत्र परिक्रमा करेंगे।" बालक ध्रुव का नाम संसार में अमर हो गया।

कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य

ध्रुव चरित्र सिखाता है कि आयु, साधन या शारीरिक बल कभी भक्ति में बाधा नहीं बनते। यदि संकल्प अटल हो और उद्देश्य शुद्ध हो, तो ईश्वर स्वयं मार्गदर्शक बनकर साक्षात दर्शन देते हैं। अपमान को प्रतिशोध में नहीं, बल्कि आत्म-कल्याण और ईश्वर-भक्ति में बदलना चाहिए।

भक्त ध्रुव: संकल्प की पराकाष्ठा

ध्रुव का अर्थ ही होता है 'अटल' और 'स्थिर'। बालक ध्रुव ने दिखाया कि मन की एकाग्रता और गुरु-प्रदत्त मंत्र की साधना से किस प्रकार पांच वर्ष की आयु में भी परम पद की प्राप्ति की जा सकती है।

साधना के चार चरण
  1. अपमान को ईश्वर-प्राप्ति की प्रेरणा बनाना।
  2. माता सुनीति से धर्मानुकूल मार्गदर्शन प्राप्त करना।
  3. देवर्षि नारद से 'द्वादशाक्षर मंत्र' की गुरु-दीक्षा लेना।
  4. मधुवन में यमुना तट पर इंद्रियों का पूर्ण निग्रह कर तप करना।
वैज्ञानिक एवं खगोलीय प्रतीक

आधुनिक खगोल विज्ञान में भी 'ध्रुव तारा' (Polaris) उत्तर दिशा का सबसे स्थिर बिंदु माना जाता है, जिससे युगों-युगों से नाविक दिशा का ज्ञान करते आए हैं। पुराणों में इसे ध्रुव जी की अटल स्थिति का प्रतीक माना गया है।