प्राचीन काल में दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि वह न दिन में मरे न रात में, न घर के भीतर मरे न बाहर, न अस्त्र से मरे न शस्त्र से, न मनुष्य द्वारा मारा जा सके और न पशु द्वारा, न पृथ्वी पर मरे और न आकाश में। इस वरदान के अहंकार में चूर होकर उसने स्वयं को ही भगवान घोषित कर दिया और अपने राज्य में भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया।
परंतु विधाता का विधान अद्भुत था। जब प्रह्लाद अपनी माता कयाधु के गर्भ में थे, तब देवर्षि नारद के आश्रम में माता ने जो हरि-कथाएं और ज्ञान सुना, उसके प्रभाव से बालक प्रह्लाद जन्म से ही भगवान नारायण के परम भक्त बने।
प्रह्लाद जब गुरुकुल से लौटते, तो पिता के पूछने पर कहते—"पिताजी! संसार का सबसे श्रेष्ठ कार्य भगवान श्री हरि के चरणों में निष्काम प्रेम करना है।" यह सुनकर हिरण्यकश्यप क्रोध से जल-भुन जाता। उसने प्रह्लाद को समझाने के लिए कई गुरु नियुक्त किए, परंतु प्रह्लाद ने अपने सहपाठियों को भी हरि-भक्ति का उपदेश देना प्रारंभ कर दिया।
अंततः क्रोधित दैत्यराज ने अपने ही पुत्र को समाप्त करने के अनेक क्रूर षड्यंत्र रचे। प्रह्लाद को ऊंचे पर्वतों से नीचे गिराया गया, विषधर सर्पों के बीच छोड़ा गया, विष का प्याला पिलाया गया, और मदमस्त हाथियों के पैरों तले कुचलवाने का प्रयास किया गया; किंतु भगवान के सुमिरन के प्रभाव से प्रह्लाद का बाल भी बांका न हुआ।
इसके बाद हिरण्यकश्यप की बहन 'होलिका' आई, जिसे अग्नि में न जलने की दिव्य ओढ़नी (वरदान) प्राप्त थी। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर धधकती चिता में बैठ गई। परंतु प्रभु की ऐसी कृपा हुई कि तीव्र वायु के झोंके से वह रक्षा-वस्त्र होलिका के शरीर से उड़कर बालक प्रह्लाद पर आ गिरा। होलिका जलकर भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद भगवान नारायण का नाम जपते हुए सकुशल बाहर निकल आए। इसी उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष 'होलिका दहन' का पर्व मनाया जाता है।
इसके बाद अत्यंत कुपित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से पूछा—"बता, तेरा भगवान कहां है? क्या वह इस राजसभा के लोहे के खंभे में भी है?" प्रह्लाद ने शांत भाव से उत्तर दिया—"हां पिताजी! मेरे प्रभु जल, थल, नभ और इस खंभे में भी विद्यमान हैं।"
अहंकारी राजा ने गदा उठाकर खंभे पर प्रहार किया। तभी एक भीषण गर्जना हुई, आकाश कांप उठा और खंभा चीरते हुए साक्षात भगवान 'नृसिंह' (आधा शरीर सिंह और आधा मनुष्य) प्रकट हुए। संध्या का समय था (न दिन था न रात), राजमहल की चौखट थी (न घर के अंदर न बाहर), भगवान ने हिरण्यकश्यप को अपनी जांघों पर लिटाया (न पृथ्वी पर न आकाश में) और अपने तीक्ष्ण नाखूनों से (न अस्त्र से न शस्त्र से) उसका वध कर दिया।
भगवान के उग्र रूप को देखकर समस्त देवगण भयभीत हो गए। तब देवताओं की प्रार्थना पर बालक प्रह्लाद ने हाथ जोड़कर भगवान नृसिंह की स्तुति की। प्रह्लाद के प्रेमपूर्ण स्पर्श से भगवान का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने बालक को गोद में उठाकर अमर भक्ति का वरदान दिया।
Katha Sangrah
Krishna
श्रीमद्भागवत महापुराण (सप्तम स्कंध)
भक्त प्रह्लाद एवं भगवान नृसिंह अवतार कथा — खंभे से प्राकट्य और होलिका दहन
दैत्यराज हिरण्यकश्यप का अहंकार, भक्त प्रह्लाद की अनन्य नारायण भक्ति, होलिका के दहन का रहस्य, और भक्त की रक्षा हेतु भगवान विष्णु के नृसिंह रूप में खंभे से प्राकट्य की पावन गाथा।
Katha Sangrah
श्रीमद्भागवत महापुराण (सप्तम स्कंध)
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भक्त प्रह्लाद एवं नृसिंह अवतार कथा
कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य
भक्त प्रह्लाद की कथा यह स्पष्ट संदेश देती है कि ईश्वर हर कण में विद्यमान हैं। सत्य और भक्ति की राह पर कितनी भी कठिन परीक्षा क्यों न आए, ईश्वर अपने शरणागत भक्त की रक्षा के लिए सभी प्राकृतिक सीमाओं को पार कर प्रकट होते हैं।
कथा का दार्शनिक रहस्य
श्रीमद्भागवत में वर्णित प्रह्लाद चरित नवधा भक्ति के 'स्मरण' और 'आत्मनिवेदन' का सर्वोच्च शिखर है। हिरण्यकश्यप अहंकार और देह-बुद्धि का प्रतीक है, जबकि प्रह्लाद विशुद्ध आत्म-समर्पण के प्रतीक हैं।
वरदान के सभी नियमों की पूर्ति
- समय: न दिन न रात — गोधूलि वेला (संध्या)।
- स्थान: न घर के भीतर न बाहर — दहलीज (चौखट)।
- माध्यम: न अस्त्र न शस्त्र — तीक्ष्ण नख।
- स्वरूप: न मनुष्य न पशु — श्री नृसिंह भगवान।
- तल: न पृथ्वी न आकाश — भगवान की गोद (जांघ)।
जीवनोपयोगी संदेश
- अहंकार का विनाश: संसार का कोई भी वरदान या धन अधर्म को नहीं बचा सकता।
- गर्भावस्था में संस्कार: माता कयाधु द्वारा सुने गए सत्संग ने प्रह्लाद को परम भक्त बनाया।
- होलिका दहन का संदेश: बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली हो, अंत में सत्य ही विजयी होता है।