Devotional Quotes & Sacred Shlokas
श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामचरितमानस, उपनिषद एवं संत कबीर के प्रेरक विचार एवं श्लोक भावार्थ सहित
श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामचरितमानस, उपनिषद एवं संत कबीर के प्रेरणादायी दिव्य विचार, सूक्तियाँ एवं श्लोक।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
भावार्थ: जो कोई भक्त प्रेमपूर्वक मुझे एक पत्ता, फूल, फल या जल भी समर्पित करता है, उस शुद्ध अंतःकरण वाले भक्त द्वारा प्रेम से भेंट किए गए उपहार को मैं…
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥
भावार्थ: हे अर्जुन! परमेश्वर समस्त प्राणियों के हृदय-प्रदेश में नित्य विराजमान हैं और अपनी माया शक्ति के द्वारा सभी जीवों को यंत्र पर आरूढ़ पुतलों की…
अहं ब्रह्मास्मि। तत्त्वमसि।
अयमात्मा ब्रह्म। प्रज्ञानं ब्रह्म॥
भावार्थ: वेदों के चार महावाक्य आत्मा की दिव्यता को प्रकट करते हैं—'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ), 'तत्त्वमसि' (तू वही परमात्मा है), 'अयमात्मा ब्रह्म'…
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
भावार्थ: हम त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करते हैं, जो दिव्य सुगंध से युक्त हैं और समस्त जीवों का पोषण व शक्ति वर्धन करते हैं। जिस प्रकार पका हुआ…
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
भावार्थ: हे देवी! आप सभी प्रकार के मंगलों में सबसे परम मंगलमयी हैं, कल्याणकारिणी हैं, समस्त पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को सिद्ध करने वाली हैं।…
दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः।
सर्पो दंशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे॥
भावार्थ: दुष्ट व्यक्ति और विषधर सर्प की तुलना में सर्प को श्रेष्ठ समझना चाहिए, क्योंकि सर्प केवल संकट या छेड़े जाने पर ही एक बार डसता है, किंतु दुष्ट…
साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाय॥
भावार्थ: हे परमात्मा! मुझे बस इतना ही धन-अन्न प्रदान कीजिए जिसमें मेरे परिवार का भरण-पोषण हो सके। न तो मैं भूखा रहूं और न ही मेरे द्वार पर आया कोई अतिथि…
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥
भावार्थ: संत कबीर कहते हैं कि हाथ में माला के मनके घुमाते-घुमाते युगों बीत गए, परंतु मन के भीतर के विकार और अशांति दूर न हुई। अरे भाई! हाथ की माला को…
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥
भावार्थ: सच्चा ज्ञान और विद्या मनुष्य को विनम्रता प्रदान करती है। विनम्रता से योग्यता (पात्रता) आती है। योग्यता से धन की प्राप्ति होती है। उस धन से धर्म…
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।
आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव॥
भावार्थ: अपनी जन्मदात्री माता को साक्षात देवता मानो। पिता को साक्षात देवता मानो। ज्ञान देने वाले आचार्य (गुरु) को देवता तुल्य मानो। और घर आए अतिथि का…
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥
भावार्थ: सत्य की ही सदा जय होती है, असत्य की कभी नहीं। सत्य के द्वारा ही वह देवयान मार्ग प्रशस्त होता है, जिससे निष्काम ऋषिगण उस सर्वोच्च धाम को प्राप्त…
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्।
सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
भावार्थ: जो कर्पूर के समान धवल गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात अवतार हैं, जो इस चराचर संसार के सार हैं और सर्पों का हार धारण करते हैं; उन भगवान शिव…
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
भावार्थ: भगवान श्री राम कहते हैं कि जिसका मन पवित्र और निष्पाप है, वही मुझे प्राप्त कर सकता है। मुझे छल, कपट, धूर्तता और दूसरों में दोष ढूंढने की वृत्ति…
कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होत तात तुम्ह पाहीं॥
भावार्थ: जाम्बवंत जी श्री हनुमान जी के पराक्रम का स्मरण कराते हुए कहते हैं—हे तात! इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है, जो आपके द्वारा संपन्न न हो…
होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अस कहि लगे जपन हरिनामा।
गए जहाँ पुनि कृपा निधाना॥
भावार्थ: वही होगा जो प्रभु श्री राम ने पहले से रच रखा है। व्यर्थ के वाद-विवाद और कुतर्कों से चिंता की शाखाएं बढ़ाने से क्या लाभ? ऐसा विचार कर मनुष्य…
जा पर कृपा राम की होई।
ता पर कृपा करहिं सब कोई॥
जाके हृदय सांच है, ताके हृदय आप।
भावार्थ: जिस मनुष्य पर भगवान श्री राम की कृपा हो जाती है, संसार के सभी प्राणी उस पर स्वतः ही स्नेह और कृपा बरसाने लगते हैं। जिसके हृदय में सत्य और सरलता…
कलयुग केवल नाम अधारा।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥
भावार्थ: कलियुग में मोक्ष का केवल एक ही मुख्य आधार है—प्रभु का पावन नाम। उस नाम का निरंतर स्मरण और जप करके मनुष्य सहज ही इस संसार रूपी भवसागर से पार…
राम नाम मनिदीप धरु जीहँ देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहिरहुँ जौं चाहसि उजियार॥
भावार्थ: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि तुम अपने भीतर और बाहर दोनों ओर आध्यात्मिक उजाला चाहते हो, तो जीभ रूपी देहली (द्वार) पर 'राम' नाम रूपी मणियों…
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
भावार्थ: समस्त धर्मों (विधियों एवं आश्रयों) को त्यागकर केवल मेरी ही शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, तुम शोक मत करो।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
भावार्थ: जो अनन्य भक्त केवल मेरा ही चिंतन करते हुए निष्काम भाव से मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य मुझमें स्थित रहने वाले भक्तों के योग (जो प्राप्त नहीं…
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
भावार्थ: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूं। साधु-संतों की रक्षा करने, दुष्टों का विनाश…
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
भावार्थ: तुम्हारा केवल कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मों के फल के हेतु (कारण) मत बनो और तुम्हारी अकर्मण्यता (कर्म…