त्रेतायुग में वानरराज केसरी की पत्नी माता अंजना पूर्वजन्म की अप्सरा पुंजिकस्थली थीं, जो एक ऋषि के श्रापवश वानर रूप में जन्मी थीं। उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। देवाधिदेव महादेव ने उन्हें अपने एकादश (११वें) रुद्र अवतार के रूप में पुत्र प्राप्त होने का वरदान दिया।
उधर अयोध्या में राजा दशरथ के पुत्रकामेष्टि यज्ञ की खीर का एक अंश एक चील झपटकर ले उड़ी, जिसे पवनदेव ने लाकर तपस्यारत माता अंजना की अंजुली में डाल दिया। उस दिव्य प्रसाद को ग्रहण करने से चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को स्वाति नक्षत्र में बाल हनुमान जी का प्राकट्य हुआ।
बालक का नाम 'मारुति' रखा गया। वे बचपन से ही असीम बल, चपलता और अलौकिक शक्तियों से संपन्न थे।
एक दिन प्रातःकाल जब माता अंजना फल लाने वन में गई थीं और बालक मारुति को भूख लगी, तो उन्होंने पूर्व दिशा में लाल-लाल, चमचमाते हुए बाल-सूर्य को उदित होते देखा। अबोध बालक ने समझा कि वह कोई बहुत मीठा और पका हुआ लाल फल है।
वे एक ही छलांग में आकाश में उड़ चले। उसी दिन सूर्य ग्रहण था और राहु सूर्य को ग्रसने के लिए आ रहा था। राहु ने देखा कि एक नन्हा वानर बालक सूर्य की ओर तीव्र गति से बढ़ रहा है। भयभीत होकर राहु देवराज इंद्र के पास पहुंचा।
इंद्र अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर पहुंचे। जब मारुति ने सूर्य को अपने मुख में रख लिया, तो संपूर्ण ब्रह्मांड में अंधकार छा गया। इंद्र ने क्रोधित होकर बालक पर अपने अमोघ अस्त्र 'वज्र' से प्रहार किया। वज्र बालक की बाईं ठोड़ी (हनु) पर लगा, जिससे वे मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
जब पवनदेव ने अपने मानस पुत्र को घायल और अचेत देखा, तो वे अत्यंत कुपित हो गए। उन्होंने संपूर्ण ब्रह्मांड से वायु (प्राणवायु) का संचार रोक दिया। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया, सभी प्राणी श्वास के बिना तड़पने लगे।
समस्त देवता ब्रह्मा जी के नेतृत्व में पवनदेव के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने अपने कर-कमलों के स्पर्श से बालक मारुति को पुनः जीवित और स्वस्थ कर दिया।
इसके पश्चात सभी देवताओं ने बालक को अपनी-अपनी अमोघ शक्तियां और वरदान समर्पित किए—
इंद्र ने कहा—"मेरे वज्र से इसकी हनु टूटी है, अतः इसका नाम 'हनुमान' होगा। मेरा वज्र भी कभी इस पर प्रभाव नहीं करेगा।"
सूर्यदेव ने अपने तेज का सौवां भाग दिया और समस्त शास्त्रों की विद्या का ज्ञान दिया।
वरुणदेव ने जल से अभय रहने का वरदान दिया।
यमराज ने कालदंड से मुक्ति दी।
भगवान शिव ने अजेय रहने और अस्त्र-शस्त्रों से सुरक्षित रहने का आशीर्वाद दिया।
ब्रह्मा जी ने अष्टसिद्धि और नवनिधि का स्वामी बनने का वरदान दिया।
इस प्रकार श्री हनुमान जी संपूर्ण ब्रह्मांड के सबसे बलशाली, अमर और बुद्धिमान सेवक बने, जिन्होंने आगे चलकर सुग्रीव-राम मित्रता कराई और लंका दहन कर सीता जी की खोज की।
Katha Sangrah
Hanuman
वाल्मीकि रामायण (उत्तरकांड) एवं शिव पुराण
श्री हनुमान जी का जन्म एवं बाल-लीला कथा — सूर्य निगरण और अष्टसिद्धि का वरदान
माता अंजना और वानरराज केसरी का तप, पवनदेव द्वारा शिव-तेज का अर्पण, बाल मारुति का प्राकट्य, उगते सूर्य को फल समझकर निगलना, इंद्र का वज्र प्रहार, वायुदेव का कोप और देवताओं द्वारा अमर वरदान।
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वाल्मीकि रामायण (उत्तरकांड) एवं शिव पुराण
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श्री हनुमान जी का जन्म एवं बाल-लीला कथा
कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य
हनुमान जी का चरित्र शक्ति, बुद्धि और भक्ति का अद्वितीय संगम है। असीम बलशाली होकर भी वे अहंकार से सर्वथा मुक्त और प्रभु श्री राम के चरणों में परम दास बने रहे। हनुमान साधना से मनुष्य के समस्त भय, रोग और संकट दूर होते हैं।
हनुमान जयंती एवं अष्टसिद्धि महात्म्य
हनुमान जी अष्टसिद्धि (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व) के दाता हैं। उनका स्मरण मात्र जीवन के समस्त संकटों को हरने वाला है।