दैत्यराज प्रह्लाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र राजा बलि अत्यंत पराक्रमी, सत्यवादी और दानवीर राजा थे। अपने कुलगुरु शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में उन्होंने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली और इंद्र को स्वर्ग से भगा दिया।
देवताओं की माता अदिति अपने पुत्रों के कष्ट से व्यथित होकर भगवान विष्णु की शरण में गईं और 'पयोव्रत' का अनुष्ठान किया। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर महर्षि कश्यप और माता अदिति के घर 'वामन' (बौने ब्राह्मण बालक) के रूप में अवतार लिया।
उस समय नर्मदा के तट पर राजा बलि अपना १००वां अश्वमेध यज्ञ संपन्न कर रहे थे। यज्ञ के नियम के अनुसार राजा किसी भी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाते थे। ठीक उसी समय छत्र, दंड और कमंडल लिए एक अत्यंत तेजस्वी, नन्हे ब्राह्मण बालक (वामन देव) यज्ञशाला में पधारे।
बलि ने उस नन्हे ब्रह्मचारी का पाद-प्रक्षालन कर अत्यंत आदर से पूछा—"हे विप्रवर! आप जो चाहें मांग लें—स्वर्ण, हाथी, घोड़े, गांव या कन्या।"
वामन देव ने मुस्कुराते हुए कहा—"हे राजन! मुझे अधिक धन-वैभव की लालसा नहीं है। मुझे केवल अपनी कुटिया और साधना के लिए अपने पैरों से नापकर मात्र तीन पग (कदम) भूमि चाहिए।"
बलि ने हंसते हुए कहा—"आप बहुत छोटे हैं, कुछ बड़ा मांगिए।" किंतु वामन अपने वचन पर अडिग रहे। बलि ने तीन पग भूमि देने का संकल्प लेने के लिए हाथ में जल का पात्र उठाया।
तभी कुलगुरु शुक्राचार्य ने पहचान लिया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, साक्षात छल करने आए भगवान विष्णु हैं। उन्होंने बलि को सावधान किया—"अरे मूर्ख! यह विष्णु है, तेरा सर्वस्व छीन लेगा। दान का संकल्प मत ले।"
किंतु दानवीर बलि ने विनम्रतापूर्वक कहा—"गुरुदेव! यदि साक्षात जगत्पिता मेरे द्वार पर याचक बनकर आए हैं, तो मैं अपने वचन से पीछे नहीं हट सकता। चाहे मेरा सर्वस्व चला जाए, मैं अपना दिया वचन अवश्य पूरा करूंगा।"
बलि ने संकल्प छोड़ दिया। संकल्प होते ही नन्हे वामन का रूप क्षण भर में विशाल 'त्रिविक्रम' बन गया। उनका सिर आकाश को छूने लगा और पैर पाताल में चले गए।
भगवान ने अपने पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी और भूलोक को नाप लिया। दूसरे पग में स्वर्ग और समस्त नक्षत्र लोक को नाप लिया। अब तीसरा पग रखने के लिए संपूर्ण ब्रह्मांड में कोई स्थान शेष न बचा।
भगवान ने बलि से पूछा—"हे राजन! दो पग में सब कुछ नाप लिया। अब बताओ, अपना तीसरा पग कहां रखूं? यदि वचन पूरा न कर सके, तो असत्यवादी होने का पाप लगेगा।"
राजा बलि ने बिना किसी भय या संकोच के हाथ जोड़े, अपना सिर झुकाया और कहा—"हे प्रभु! संपत्ति से बड़ा संपत्ति का स्वामी होता है। आप अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर रखिए!"
भगवान वामन ने बलि के मस्तक पर अपना पावन चरण रखा और उसे पाताल लोक (सुतल लोक) में भेज दिया। बलि के इस अनन्य त्याग और सत्यनिष्ठा से भगवान इतने मुग्ध हुए कि उन्होंने बलि को सुतल लोक का इंद्र बना दिया और स्वयं उसके महल के पहरेदार (द्वारपाल) बनकर खड़े हो गए।
Katha Sangrah
Krishna
श्रीमद्भागवत महापुराण (अष्टम स्कंध)
भगवान वामन अवतार एवं राजा बलि कथा — तीन पग भूमि और त्रिविक्रम स्वरूप
दानवीर असुरराज बलि का १००वां अश्वमेध यज्ञ, कश्यप और अदिति के पुत्र रूप में वामन का प्राकट्य, तीन पग भूमि की याचना, शुक्राचार्य की चेतावनी, त्रिविक्रम रूप में ब्रह्मांड का मापन और बलि का आत्म-समर्पण।
Katha Sangrah
श्रीमद्भागवत महापुराण (अष्टम स्कंध)
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भगवान वामन अवतार एवं राजा बलि कथा
कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य
वामन अवतार हमें सिखाता है कि दान केवल धन का नहीं, अपितु अपने अहंकार और स्वयं के समर्पण (आत्मनिवेदन) का नाम है। जब मनुष्य ईश्वर के चरणों में अपना सर्वस्व सौंप देता है, तो स्वयं ईश्वर उसके रक्षक और दास बन जाते हैं।
राजा बलि का महान त्याग और ओणम पर्व
दक्षिण भारत (विशेषकर केरल) में मनाया जाने वाला 'ओणम' पर्व राजा बलि के इसी न्याय, दान और प्रजा-वत्सल चरित्र के सम्मान में प्रतिवर्ष मनाया जाता है।