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दैनिक संध्या वंदन एवं गायत्री जप — सनातन ब्रह्मकर्म की सरल विधि

प्रत्येक सनातनी के लिए त्रिकाल संध्या (प्रातः, मध्याह्न, सायं) का आध्यात्मिक महत्त्व, आचमन, प्राणायाम, मार्जन, अघमर्षण और गायत्री महामंत्र के १०८ जप का फल।

दैनिक संध्या वंदन एवं गायत्री जप — सनातन ब्रह्मकर्म की सरल विधि
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दैनिक संध्या वंदन एवं गायत्री जप विधि

'संध्या' का अर्थ है दो कालों का मिलन बिंदु। दिन और रात्रि के मिलन को त्रिकाल संध्या कहा जाता है—प्रातःकाल (सूर्योदय से पूर्व), मध्याह्न (दोपहर १२ बजे) और सायंकाल (सूर्यास्त के समय)।

शास्त्रों में संध्या वंदन को 'नित्य कर्म' माना गया है, जिसे करने से बुद्धि प्रखर, शरीर ओजस्वी और आत्मा पवित्र होती है।

संध्या वंदन के मुख्य अंग:
१. आचमन: जल द्वारा आंतरिक इंद्रियों का पवित्रीकरण ("ॐ केशवाय नमः, ॐ माधवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः")।
२. प्राणायाम: श्वास के नियमन द्वारा प्राणों की स्थिरता।
३. मार्जन एवं अघमर्षण: पाप-वासनाओं के प्रक्षालन हेतु जल छिड़कना।
४. सूर्योपस्थान (अर्घ्य दान): तांबे के पात्र से सूर्यदेव को गायत्री मंत्र बोलते हुए तीन बार जल का अर्घ्य देना।
५. गायत्री जप: शांत चित्त से रुद्राक्ष या तुलसी की माला पर कम से कम १०८ बार गायत्री महामंत्र का मानसिक या उपांशु जप करना।

गायत्री महामंत्र:
"ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥"

कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य

दैनिक संध्या वंदन और गायत्री जप से मनुष्य की मेधा बुद्धि, एकाग्रता और आत्म-बल में अभूतपूर्व वृद्धि होती है। यह आत्मा का परमात्मा के साथ दैनिक मिलन है।

संध्या वंदन से स्वास्थ्य लाभ

प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में प्राणायाम और सूर्य को अर्घ्य देने से नेत्र ज्योति बढ़ती है, विटामिन डी प्राप्त होता है और मानसिक तनाव से पूर्ण मुक्ति मिलती है।