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नवरात्रि पूजा विधि, घटस्थापना एवं कलश स्थापना नियम

शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना, घटस्थापना का पावन शुभ मुहूर्त, आवश्यक पूजन सामग्री और कलश स्थापना की सरल एवं प्रामाणिक वैदिक विधि।

नवरात्रि पूजा विधि, घटस्थापना एवं कलश स्थापना नियम
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नवरात्रि पूजा विधि एवं घटस्थापना नियम

नवरात्रि सनातन धर्म का अत्यंत पवित्र पर्व है जिसमें आदिशक्ति माँ भगवती के नौ स्वरूपों (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडो, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री) की विशेष आराधना की जाती है।

घटस्थापना (कलश स्थापना) नवरात्रि के प्रथम दिन प्रातःकाल शुभ मुहूर्त में की जाती है। कलश को भगवान गणेश, त्रिदेवों और समस्त तीर्थों का साक्षात प्रतीक माना जाता है।

आवश्यक सामग्री:
१. मिट्टी का एक स्वच्छ पात्र और पवित्र मिट्टी
२. जौ (जवारे बोने हेतु)
३. तांबे या पीतल का कलश और शुद्ध जल/गंगाजल
४. आम अथवा अशोक के ५ या ७ पत्ते
५. रोली, अक्षत (अखंडित चावल), सुपारी, सिक्का और कलावा (मौली)
६. नारियल (श्रीफल) जिसे लाल वस्त्र अथवा चुनरी में लपेटा गया हो।

स्थापना विधि:
सर्वप्रथम पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में चौकी स्थापित कर लाल वस्त्र बिछाएं। मिट्टी के पात्र में जौ और मिट्टी की परतें बिछाएं। कलश के कंठ में मौली बांधें और उसमें गंगाजल भरें। कलश में रोली, अक्षत, सुपारी और सिक्का डालें। पल्लव (आम के पत्ते) लगाकर ऊपर से नारियल स्थापित करें। इसके पश्चात हाथ जोड़कर वरुण देव और माँ जगदंबा का ध्यान करें।

कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य

नवरात्रि केवल उपवास का पर्व नहीं, अपितु अंतःकरण के शुद्धिकरण और आत्मिक शक्तियों के जागरण का काल है। संयम, सात्विकता और अनन्य भक्ति से जीवन की समस्त नकारात्मक ऊर्जाएं समाप्त हो जाती हैं।

घटस्थापना के नियम एवं सावधानियां

घटस्थापना सदैव प्रतिपदा तिथि के पहले एक-तिहाई भाग में या अभिजित मुहूर्त में ही करनी चाहिए। चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में कलश स्थापना का निषेध बताया गया है।