द्वापर युग में प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन ब्रजवासी देवराज इंद्र को प्रसन्न करने के लिए एक विशाल यज्ञ का आयोजन करते थे। उनका मानना था कि इंद्र वर्षा के स्वामी हैं और उन्हीं की कृपा से घास, अन्न और जल प्राप्त होता है जिससे उनकी गाएं जीवित रहती हैं।
एक बार जब सात वर्षीय बाल-कृष्ण ने नंदबाबा और ब्रज के वरिष्ठ गोपों को नाना प्रकार के मिष्ठान्न और पकवान बनाते देखा, तो उन्होंने जिज्ञासावश पूछा—"पिताजी! यह किस देवता की पूजा की तैयारी हो रही है?"
नंदबाबा ने कहा—"बेटा! यह देवराज इंद्र का पूजन है। वे मेघों के स्वामी हैं और वर्षा करते हैं।" श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए तर्क दिया—"पिताजी! वर्षा तो प्रकृति और कर्मों के अधीन है। हमारा वास्तविक पालन-पोषण तो यह गिरिराज गोवर्धन और गौएं करती हैं। पर्वत हमें कंद-मूल, औषधियां और गायों के लिए हरी घास देते हैं। इसलिए यदि पूजा करनी ही है, तो हमें प्रत्यक्ष उपकारी गोवर्धन पर्वत, गौ-माता और विप्रों का पूजन करना चाहिए।"
ब्रजवासियों को कन्हैया की बात हृदयस्पर्शी लगी। सभी ने इंद्र-यज्ञ रोक दिया और ५६ प्रकार के भोग (अन्नकूट) बनाकर गोवर्धन पर्वत की पूजा और परिक्रमा की। भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं एक विशाल दिव्य रूप धारण कर पर्वत के शिखर पर प्रकट होकर कहा—"मैं ही गिरिराज हूं" और ब्रजवासियों द्वारा अर्पित समस्त भोग को स्वीकार किया।
जब देवराज इंद्र को पता चला कि एक सामान्य बालक के कहने पर ब्रजवासियों ने उसका पारंपरिक पूजन बंद कर दिया है, तो वह अत्यंत कुपित हो गया। अपने अभिमान में उसने प्रलयंकारी 'संवर्तक' मेघों को आदेश दिया कि वे संपूर्ण ब्रजभूमि को जलमग्न कर बहा दें।
आकाश में भीषण गर्जना होने लगी। मूसलाधार बारिश, ओलावृष्टि और तूफानी हवाओं से ब्रजवासी त्राहि-त्राहि करने लगे। समस्त गोप-गोपियां और पशु भयभीत होकर कन्हैया की शरण में पहुंचे—"हे कृष्ण! हमारी रक्षा करो!"
भगवान श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा—"जिस गिरिराज की हमने पूजा की है, वही हमारी रक्षा करेंगे।" इतना कहकर सात वर्ष के बाल-कृष्ण ने खेल-खेल में विशाल गोवर्धन पर्वत को उखाड़ लिया और अपनी बाएं हाथ की छोटी अंगुली (कनिष्ठा) पर एक छत्र की भांति उठा लिया।
भगवान ने सभी ब्रजवासियों, गायों और पशु-पक्षियों को पर्वत की छत्रछाया के नीचे बुला लिया। ब्रजवासी सात दिनों तक बिना किसी भय के पर्वत के नीचे सुखपूर्वक रहे। सात दिनों तक लगातार मूसलाधार वर्षा करने के बाद भी ब्रज का एक पत्ता भी नहीं भीगा और इंद्र के मेघों का जल समाप्त हो गया।
इंद्र का अहंकार चूर-चूर हो गया। आकाश स्वच्छ हो गया और सूर्यदेव मुस्कुराने लगे। भगवान ने गोवर्धन पर्वत को पुनः उसके स्थान पर स्थापित कर दिया। लज्जित होकर देवराज इंद्र अपनी कामधेनु सुरभि गाय और ऐरावत हाथी के साथ प्रभु के चरणों में गिर पड़ा। इंद्र ने क्षमा याचना की और कामधेनु के दूध से प्रभु का अभिषेक कर उन्हें "गोविंद" (गायों और इंद्रियों के रक्षक) नाम से सुशोभित किया।
Katha Sangrah
Krishna
श्रीमद्भागवत महापुराण एवं विष्णु पुराण
गोवर्धन पूजा एवं इंद्र मान-भंग कथा — कनिष्ठा अंगुली पर गिरिराज धारण
ब्रजवासियों द्वारा इंद्र यज्ञ की प्राचीन परंपरा, भगवान श्री कृष्ण द्वारा प्रकृति और गोवर्धन पर्वत की पूजा का उपदेश, कुपित इंद्र द्वारा प्रलयंकारी संवर्तक मेघों की वर्षा, और सात दिनों तक पर्वत धारण की अद्भुत लीला।
Katha Sangrah
श्रीमद्भागवत महापुराण एवं विष्णु पुराण
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गोवर्धन पूजा एवं इंद्र मान-भंग कथा
कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य
गोवर्धन लीला हमें प्रकृति, पर्यावरण और कर्म के प्रति कृतज्ञ रहने की सीख देती है। यह अहंकार के विनाश और शरणागत-वत्सलता का अनुपम संदेश है। जब हम ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखते हैं, तो वे बड़े से बड़े संकट को अपनी छोटी अंगुली पर उठा लेते हैं।
प्रकृति संरक्षण और अन्नकूट का संदेश
गोवर्धन पूजा केवल एक पौराणिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति का पर्यावरण-उन्मुख दृष्टिकोण है जहां पर्वत, नदी, वृक्ष और गौ-वंश को पूज्य मानकर उनके संरक्षण का संकल्प लिया जाता है।