Katha Sangrah Shiva श्रीमद्वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत (वन पर्व)

माँ गंगा अवतरण एवं भगीरथ की तपस्या कथा — सगर के ६०,००० पुत्रों का उद्धार

सूर्यवंशी राजा सगर के अश्वमेध घोड़े की चोरी, कपिल मुनि के कोप से ६०,००० राजकुमारों का भस्म होना, भगीरथ की पीढ़ियों की घोर तपस्या, शिव की जटाओं में गंगा का समाना और पाताल लोक तक मुक्ति प्रवाह।

माँ गंगा अवतरण एवं भगीरथ की तपस्या कथा — सगर के ६०,००० पुत्रों का उद्धार
Katha Sangrah श्रीमद्वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत (वन पर्व)
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माँ गंगा अवतरण एवं भगीरथ की तपस्या कथा

अयोध्या के सूर्यवंशी महाराज सगर ने चक्रवर्ती पद की प्राप्ति हेतु अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। देवराज इंद्र ने भयभीत होकर यज्ञ का घोड़ा चुरा लिया और उसे पाताल लोक में तपस्या में लीन महर्षि कपिल के आश्रम में बांध दिया।

राजा सगर के ६०,००० पुत्र घोड़े की खोज में पृथ्वी को खोदते हुए पाताल पहुंचे। वहां मुनि के पास घोड़ा देखकर उन्होंने कपिल मुनि को चोर समझकर अपशब्द कहे और आक्रमण करने दौड़े। मुनि ने जैसे ही अपने नेत्र खोले, उनके तपो-तेज से राजा सगर के साठ हजार पुत्र उसी क्षण जलकर भस्म हो गए।

वे राजकुमार प्रेतयोनि में भटकने लगे। बाद में सगर के पौत्र अंशुमान ने कपिल मुनि को प्रसन्न किया। मुनि ने बताया कि केवल स्वर्ग की पावन नदी 'गंगा' के जल से ही इन भस्म हुए पूर्वजों की अस्थियों का उद्धार हो सकता है।

अंशुमान और उनके पुत्र दिलीप ने आजीवन तपस्या की, किंतु गंगा को पृथ्वी पर न ला सके। अंततः दिलीप के पुत्र महाराज 'भगीरथ' ने अपने पूर्वजों के उद्धार का दृढ़ संकल्प लिया।

भगीरथ ने गोकर्ण तीर्थ में जाकर सहस्रों वर्षों तक अंगूठे के बल खड़े होकर कठोर तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माँ गंगा प्रकट हुईं। गंगा ने कहा—"हे राजन! मैं पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हूं, किंतु मेरे तीव्र वेग को पृथ्वी सहन नहीं कर सकेगी और वह रसातल में समा जाएगी। मेरे वेग को केवल देवाधिदेव महादेव ही संभाल सकते हैं।"

भगीरथ ने पुनः कैलास पर जाकर भगवान शिव की कठिन तपस्या की। आशुतोष भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगा के वेग को अपनी जटाओं में थामने का वचन दिया।

गंगा को अपने वेग पर बड़ा अभिमान था। वे पूरे वेग से आकाश से शिव जी के मस्तक पर गिरीं और विचार किया कि शिव जी को भी बहाकर पाताल ले जाएंगी। महादेव ने उनके अहंकार को जानकर अपनी जटाओं को बांध लिया। गंगा शिव जी की जटाओं में खोकर रह गईं और बाहर निकलने का मार्ग न पा सकीं।

भगीरथ ने पुनः प्रार्थना की। तब भगवान शिव ने अपनी जटा की एक लट खोली, जिससे गंगा की शांत, पावन धाराएं पृथ्वी पर प्रवाहित हुईं।

भगीरथ अपने दिव्य रथ पर आगे-आगे चले और माँ गंगा उनके पीछे-पीछे बही। मार्ग में गंगा ने महर्षि जह्नु के आश्रम को बहा दिया। कुपित होकर जह्नु मुनि गंगा का सारा जल पी गए। भगीरथ की प्रार्थना पर मुनि ने गंगा को अपने कान से बाहर निकाला, जिससे गंगा का नाम 'जाह्नवी' पड़ा।

अंततः गंगा पाताल लोक पहुंचीं और उन्होंने सगर के ६०,००० पुत्रों की भस्म का स्पर्श किया। स्पर्श होते ही वे सभी शापमुक्त होकर दिव्य विमानों पर बैठकर वैकुंठ को प्राप्त हुए। जिस स्थान पर गंगा समुद्र में मिलीं, वह आज 'गंगासागर' कहलाता है।

कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य

भगीरथ की कथा हमें "भागीरथ प्रयास" (अथक परिश्रम) की प्रेरणा देती है। जब मनुष्य अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र और दृढ़-प्रतिज्ञ होता है, तो वह स्वर्ग की नदी को भी पृथ्वी पर उतार सकता है। गंगा केवल जल नहीं, अपितु सनातन संस्कृति की जीवनधारा है।

गंगा दशहरा का पर्व एवं पावन फल

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन गंगा स्नान और दान करने से कायिक, वाचिक और मानसिक दस प्रकार के पापों का क्षय होता है।