Katha Sangrah Lakshmi विष्णु पुराण एवं स्कंद पुराण (कार्तिक महात्म्य)

माँ लक्ष्मी प्राकट्य एवं दीपावली कथा — क्षीरसागर से ऐश्वर्य और प्रकाश का उदय

समुद्र मंथन के समय क्षीरसागर से कमल पुष्प पर आरूढ़ माँ महालक्ष्मी का दिव्य प्राकट्य, भगवान विष्णु का वरण, कार्तिक अमावस्या की पावन निशा में दीप प्रज्वलन और अष्टलक्ष्मी की आराधना।

माँ लक्ष्मी प्राकट्य एवं दीपावली कथा — क्षीरसागर से ऐश्वर्य और प्रकाश का उदय
Katha Sangrah विष्णु पुराण एवं स्कंद पुराण (कार्तिक महात्म्य)
Text:

माँ लक्ष्मी प्राकट्य एवं दीपावली कथा

प्राचीन काल में जब दुर्वासा ऋषि के श्राप से तीनों लोक श्रीहीन और दरिद्र हो गए थे, तब देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया था। जब हलाहल विष और अन्य रत्नों के पश्चात कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि आई, तब क्षीरसागर से एक अत्यंत अद्भुत, मनोहारी और दिव्य प्रकाश पुंज प्रकट हुआ।

उस दिव्य प्रकाश के मध्य एक सहस्र दल वाले विशाल कमल पुष्प पर विराजमान साक्षात धन, ऐश्वर्य, सौभाग्य और सौंदर्य की अधिष्ठात्री देवी 'माँ महालक्ष्मी' प्रकट हुईं।

माँ लक्ष्मी के हाथ में कमल पुष्प सुशोभित था, उनके शरीर से स्वर्ण-तुल्य आभा छिटक रही थी। उनके प्राकट्य के समय दिशाओं के चार विशाल श्वेत गजों (हाथियों) ने अपनी सूंडों में स्वर्ण कलश लेकर देवी का दिव्य अभिषेक किया।

गंधर्व मधुर गान करने लगे, अप्सराएं नृत्य करने लगीं और ऋषि-मुनि वेदों की श्रीसूक्त ऋचाओं से भगवती की स्तुति करने लगे।

उस समय सभा में उपस्थित सभी देवता, यक्ष और असुर माँ लक्ष्मी का वरण करना चाहते थे। किंतु माँ महालक्ष्मी ने अपने हाथों में पावन वैजयंती वरमाला ली और संसार के पालनहार, शांत, क्षमाशील और धर्मपरायण भगवान श्री हरि विष्णु के गले में डाल दी। इस प्रकार माँ लक्ष्मी सदा के लिए भगवान विष्णु की अर्धांगिनी और वैकुंठ की स्वामिनी बनीं।

माँ लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर देवताओं को अपना आशीर्वाद दिया जिससे तीनों लोकों का खोया हुआ ऐश्वर्य, कांति और सुख-समृद्धि पुनः लौट आई।

इसके साथ ही यह भी मान्यता है कि कार्तिक अमावस्या की इसी रात्रि को १४ वर्ष के वनवास और रावण वध के पश्चात मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ अयोध्या लौटे थे। अवधवासियों ने अपने प्रभु के स्वागत में घी के दीपक जलाकर पूरी अयोध्या को जगमगा दिया था।

तभी से प्रतिवर्ष कार्तिक अमावस्या के दिन 'दीपावली' का महापर्व अत्यंत श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। इस रात्रि में माँ लक्ष्मी और विघ्नहर्ता श्री गणेश की संयुक्त पूजा की जाती है ताकि घर-परिवार में बुद्धि और समृद्धि दोनों का वास हो सके।

कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य

माँ लक्ष्मी केवल भौतिक धन की देवी नहीं, बल्कि वे धर्म, सत्य, स्वच्छता, संतोष और प्रेम की प्रतीक हैं। जहां स्वच्छता, सदाचार और बड़ों का आदर होता है, वहीं लक्ष्मी का स्थायी वास होता है। गणेश जी के साथ लक्ष्मी की पूजा यह सिखाती है कि धन के साथ विवेक होना अनिवार्य है।

दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश पूजन का रहस्य

शास्त्रों के अनुसार, केवल धन (लक्ष्मी) का आगमन यदि बिना सद्बुद्धि (गणेश) के हो, तो वह मनुष्य में मद और पतन लाता है। इसलिए दोनों की संयुक्त आराधना से जीवन में संतुलित समृद्धि प्राप्त होती है।