सृष्टि के आरंभ में परमपिता ब्रह्मा जी ने भगवान श्री हरि विष्णु की आज्ञा से चराचर जगत, जीवों, वृक्षों और मनुष्यों की रचना की। किंतु जब ब्रह्मा जी ने अपनी बनाई सृष्टि को देखा, तो वे अत्यंत उदास और असंतुष्ट हो गए।
चारों ओर घोर सन्नाटा और नीरवता छाई हुई थी। न कोई ध्वनि थी, न कोई वाणी, न कोई पक्षियों का कलरव और न कोई वायु की सरसराहट। संपूर्ण संसार एक मूक, जड़ और अंधकारमय अवस्था में प्रतीत हो रहा था।
अपनी रचना में इस भारी कमी को देखकर ब्रह्मा जी क्षीरसागर में भगवान विष्णु के पास पहुंचे। उन्होंने कहा—"हे प्रभु! मैंने सृष्टि की रचना तो कर दी, किंतु इसमें कोई रस, उल्लास, ज्ञान या संवाद नहीं है। यह सब कुछ मौन और मृतप्राय जान पड़ता है।"
भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा—"हे ब्रह्मदेव! ज्ञान और वाणी के बिना कोई भी रचना जीवंत नहीं हो सकती। आप आदिशक्ति भगवती ज्ञानदा की आराधना कीजिए।"
ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल लेकर संकल्प किया और पृथ्वी पर छिड़का। जल कणों के बिखरते ही कुंज-वनों से एक दिव्य श्वेत ज्योति प्रकट हुई। उस महाज्योति के मध्य से श्वेत वस्त्र धारण किए, श्वेत कमल पर विराजमान चतुर्भुजा भगवती 'माँ सरस्वती' प्रकट हुईं।
उनके एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में वरद मुद्रा, तीसरे हाथ में वेद (पुस्तक) और चौथे हाथ में स्फटिक की माला सुशोभित थी। उनके मुखमंडल पर करोड़ों सूर्यों का ज्ञान-तेज और चंद्रमा की शीतलता थी।
ब्रह्मा जी ने हाथ जोड़कर देवी से प्रार्थना की—"हे वाग्देवी! इस मूक और जड़ सृष्टि को अपनी वीणा के दिव्य स्वरों से वाणी और चेतना प्रदान कीजिए।"
माँ सरस्वती ने मुस्कुराते हुए अपनी वीणा के तारों को झंकृत किया। उस प्रथम झंकार से तीनों लोकों में 'ॐ' कार का नाद गूंज उठा। वायु में सरसराहट, नदियों में कलकल का संगीत, पक्षियों में मधुर कलरव और समस्त प्राणियों के कंठ में वाणी और चेतना का संचार हो गया।
इसके साथ ही वेदों के षड्ज, ऋषभ, गांधार आदि सातों सुर, ६४ कलाएं, साहित्य, संगीत, व्याकरण और विवेक की उत्पत्ति हुई। उस पावन दिन माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी, जिसे आज संपूर्ण भारत में 'वसंत पंचमी' के रूप में माँ सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
Katha Sangrah
Saraswati
ब्रह्मवैवर्त पुराण एवं मत्स्य पुराण
माँ सरस्वती अवतरण एवं विद्या प्राकट्य कथा — वीणा वादन और वसंत पंचमी
ब्रह्मा जी द्वारा मौन और नीरव सृष्टि का निर्माण, व्याकुलता में भगवान विष्णु की स्तुति, कमंडल से जल छिड़कने पर चतुर्भुजा वीणावादिनी माँ सरस्वती का प्राकट्य, संपूर्ण ब्रह्मांड में वाणी और संगीत का संचार।
Katha Sangrah
ब्रह्मवैवर्त पुराण एवं मत्स्य पुराण
Text:
माँ सरस्वती अवतरण एवं विद्या प्राकट्य कथा
कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य
माँ सरस्वती की कथा यह संदेश देती है कि बाह्य संसार कितना भी समृद्ध क्यों न हो, यदि जीवन में ज्ञान, वाणी, संगीत और सद्विवेक नहीं है, तो जीवन शून्य है। शिक्षा और विद्या का सदुपयोग लोक-कल्याण और सत्य की अभिव्यक्ति के लिए ही होना चाहिए।
वसंत पंचमी: ज्ञान और विद्या का उत्सव
वसंत पंचमी के दिन छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर-ज्ञान (अक्षरारंभ संस्कार) कराया जाता है, जिससे उनकी बुद्धि प्रखर और वाणी ओजस्वी बनती है।