ब्रह्मा जी के मानस पुत्र प्रजापति दक्ष की पुत्री के रूप में आदिशक्ति ने सती नाम से जन्म लिया था। माता सती ने कठोर तपस्या करके देवाधिदेव भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। किंतु प्रजापति दक्ष अपने अहंकार और अभिमान के कारण औघड़, भस्मधारी और श्मशानवासी महादेव से अत्यधिक ईर्ष्या और द्वेष रखते थे।
एक बार दक्ष ने कनखल (हरिद्वार) में एक अत्यंत विशाल 'बृहस्पतिसव' नामक यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में दक्ष ने तीनों लोकों के सभी देवताओं, ऋषियों, गंधर्वों और यक्षों को ससम्मान आमंत्रित किया, किंतु जानबूझकर भगवान शिव और अपनी पुत्री सती को निमंत्रण नहीं भेजा।
माता सती ने आकाश मार्ग से सभी देवताओं के विमानों को अपने पिता के यज्ञ की ओर जाते देखा। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके मायके में इतना बड़ा महोत्सव हो रहा है, तो उनका मन वहां जाने के लिए व्याकुल हो उठा। उन्होंने भगवान शिव से जाने की अनुमति मांगी।
भगवान शिव ने प्रेमपूर्वक समझाया—"हे देवी! बिना निमंत्रण के सगे-संबंधियों के घर भी नहीं जाना चाहिए, विशेषकर वहां जहां आपका अनादर करने का दुर्भाव हो। तुम्हारे पिता मुझसे द्वेष रखते हैं, इसलिए वहां जाने पर क्लेश ही होगा।"
किंतु माता सती का मोह प्रबल था। उन्होंने सोचा कि पिता के घर जाने के लिए निमंत्रण की क्या आवश्यकता। अंततः भगवान शिव ने अपने नंदी आदि गणों को उनके साथ भेज दिया।
जब सती कनखल में यज्ञ मंडप में पहुंचीं, तो दक्ष ने उनका कोई आदर नहीं किया। केवल उनकी माता प्रसूति ने उन्हें गले से लगाया, जबकि अन्य बहनें उपहास करने लगीं। दक्ष ने भारी सभा में भगवान शिव के प्रति अत्यंत अपमानजनक, कटु और अमर्यादित शब्दों का प्रयोग किया।
अपने परम पूज्य पति देवाधिदेव महादेव का ऐसा घोर अपमान देखकर माता सती का हृदय क्षोभ और ग्लानि से भर गया। उन्होंने भरी सभा में गरजते हुए कहा—"हे दक्ष! जिस देवाधिदेव शिव के नाम मात्र के उच्चारण से संपूर्ण ब्रह्मांड पवित्र हो जाता है, तूने उन जगत्पिता का अपमान किया है। ऐसा घोर पापी मेरा पिता है, इस देह को धारण करना मेरे लिए धिक्कार है!"
इतना कहकर माता सती ने यज्ञ मंडप में उत्तर दिशा की ओर मुख कर योगासन लगाया और अपनी आंतरिक योगाग्नि प्रज्वलित कर अपने शरीर को उसी क्षण भस्म कर दिया।
नंदी आदि गणों ने यह समाचार कैलास पहुंचकर भगवान शिव को सुनाया। समाचार सुनते ही देवाधिदेव महादेव का तीसरा नेत्र खुल गया। उन्होंने अपनी जटा से एक बाल उखाड़कर पर्वत पर पटका, जिससे महापराक्रमी 'वीरभद्र' और 'महाकाली' प्रकट हुए।
भगवान शिव की आज्ञा पाकर वीरभद्र ने अपनी सेना के साथ दक्ष के यज्ञ मंडप पर धावा बोल दिया। उन्होंने यज्ञशाला को तहस-नहस कर दिया, देवताओं को दंडित किया और अभिमानी दक्ष का सिर काटकर उसी यज्ञ कुंड की अग्नि में स्वाहा कर दिया। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर शिव जी ने दक्ष के धड़ पर बकरे का सिर लगाकर उसे जीवनदान दिया।
इसके पश्चात भगवान शिव सती के पार्थिव शरीर को अपने कंधों पर उठाकर वैराग्य में लीन होकर तीनों लोकों में तांडव करने लगे। शिव के इस महाप्रलयंकारी रूप से सृष्टि संकट में पड़ गई। तब सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान श्री हरि विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के पार्थिव शरीर को क्रमशः ५१ अंगों में विभाजित कर दिया।
वे ५१ अंग पृथ्वी पर जिन-जिन पवित्र स्थानों पर गिरे, वे स्थान आज '५१ महाशक्तिपीठ' कहलाते हैं (जैसे कामरूप कामाख्या में योनि पीठ, हिंगलाज में ब्रह्मरंध्र, ज्वालाजी में जिह्वा आदि)। भगवान शिव ने स्वयं उन सभी शक्तिपीठों पर भैरव के रूप में अपनी उपस्थिति स्थापित की।
Katha Sangrah
Shiva
श्रीमद्देवीभागवत महापुराण एवं शिव पुराण
माता सती का आत्मत्याग एवं दक्ष यज्ञ विध्वंस कथा — ५१ शक्तिपीठों का प्राकट्य
प्रजापति दक्ष का अहंकार, भगवान शिव से द्वेष, कनखल में विशाल बृहस्पतिसव यज्ञ का आयोजन, माता सती का अपमान और योगाग्नि में देहत्याग, वीरभद्र द्वारा यज्ञ विध्वंस और ५१ शक्तिपीठों की उत्पत्ति।
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श्रीमद्देवीभागवत महापुराण एवं शिव पुराण
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माता सती का आत्मत्याग एवं दक्ष यज्ञ विध्वंस कथा
कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य
दक्ष यज्ञ विध्वंस की कथा हमें चेतावनी देती है कि अभिमान और ईश्वरीय सत्ता की अवहेलना का अंत सर्वनाश होता है। पति-पत्नी के परस्पर आदर और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करने से कुल का विनाश हो जाता है। शक्ति के बिना शिव अधूरे हैं और शिव के बिना शक्ति नहीं।
५१ शक्तिपीठों का आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व
सती के आत्मत्याग से प्रकट हुए ५१ शक्तिपीठ भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता के सूत्रधार हैं, जहां आज भी लाखों श्रद्धालु आदिशक्ति की कृपा प्राप्त करते हैं।