Katha Sangrah Shiva श्रीमद्भागवत महापुराण एवं विष्णु पुराण

समुद्र मंथन एवं अमृत प्राप्ति कथा — भगवान शिव का नीलकंठ रूप और चौदह रत्न

देवर्षि दुर्वासा का श्राप, श्रीहीन देवताओं का दानवों के साथ क्षीरसागर मंथन, मंदराचल और वासुकि नाग का मंथन-दण्ड, हलाहल विष का पान कर शिव का नीलकंठ बनना, १४ दिव्य रत्नों का प्राकट्य और मोहिनी रूप।

समुद्र मंथन एवं अमृत प्राप्ति कथा — भगवान शिव का नीलकंठ रूप और चौदह रत्न
Katha Sangrah श्रीमद्भागवत महापुराण एवं विष्णु पुराण
Text:

समुद्र मंथन एवं अमृत प्राप्ति कथा

एक बार देवराज इंद्र अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर जा रहे थे। मार्ग में महर्षि दुर्वासा मिले और उन्होंने आदरपूर्वक भगवान विष्णु की दिव्य पारिजात पुष्पों की माला इंद्र को भेंट की। ऐश्वर्य के मद में चूर इंद्र ने वह माला अपने हाथी ऐरावत के मस्तक पर रख दी। हाथी ने पुष्पों की तीखी गंध से विचलित होकर माला को सूंड से खींचकर पृथ्वी पर फेंक दिया और पैरों तले कुचल दिया।

अपने दिए उपहार का ऐसा घोर अनादर देखकर महर्षि दुर्वासा अत्यंत कुपित हो गए। उन्होंने तुरंत श्राप दिया—"हे इंद्र! ऐश्वर्य के अभिमान में तूने श्री हरि के प्रसाद का अपमान किया है। इसलिए तू और तीनों लोक तत्काल श्रीहीन, शक्तिहीन और वैभवहीन हो जाएं!"

श्राप के प्रभाव से स्वर्ग की लक्ष्मी लुप्त हो गईं। दैत्यराज बलि के नेतृत्व में असुरों ने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवताओं को पराजित कर भगा दिया। निराश और शक्तिहीन देवगण ब्रह्मा जी के साथ भगवान श्री हरि विष्णु के पास क्षीरसागर पहुंचे।

भगवान विष्णु ने युक्ति सुझाई—"इस समय असुर शक्तिशाली हैं, अतः उनसे संधि कर लो। क्षीरसागर का मंथन करो जिससे अमृत निकलेगा। अमृत पीकर तुम अमर हो जाओगे।" देवताओं ने दैत्यों के साथ अमृत का साझा करने की शर्त पर संधि कर ली।

क्षीरसागर में मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को नेती (रस्सी) बनाया गया। नागराज के मुख की ओर दैत्य खड़े हुए और पूंछ की ओर देवता। मंथन प्रारंभ होते ही भारी मंदराचल पर्वत समुद्र में डूबने लगा। तब भगवान विष्णु ने विशाल कच्छप (कूर्म/कछुआ) का अवतार धारण किया और अपनी पीठ पर पर्वत को थाम लिया।

मंथन के प्रारंभ में ही समुद्र से अत्यंत भयंकर, नीला 'हलाहल' (कालकूट) विष निकला। उस विष की ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। समस्त जीव-जंतु और देवता व्याकुल होकर देवाधिदेव महादेव की शरण में कैलास पहुंचे।

करुणामय भगवान शिव ने संसार की रक्षा हेतु बिना किसी संकोच के उस भयंकर विष का आचमन कर लिया। माता पार्वती ने विष के प्रभाव को शिव जी के पेट में जाने से रोकने के लिए उनके कंठ को थाम लिया। विष के प्रभाव से महादेव का कंठ नीला पड़ गया और वे सदा के लिए "नीलकंठ" कहलाए।

इसके पश्चात क्षीरसागर से १४ दिव्य रत्न प्रकट हुए—
१. कामधेनु गाय (ऋषियों को दी गई)
२. उच्चैःश्रवा अश्व (दैत्यराज बलि को मिला)
३. ऐरावत हाथी (इंद्र को प्राप्त हुआ)
४. कौस्तुभ मणि (भगवान विष्णु ने धारण की)
५. कल्पवृक्ष (स्वर्ग में स्थापित हुआ)
६. रंभा आदि अप्सराएं
७. माता महालक्ष्मी (कमल पर विराजमान होकर प्रकट हुईं और भगवान विष्णु का वरण किया)
८. वारुणी मदिरा (दैत्यों को मिली)
९. चंद्रमा (महादेव ने अपने मस्तक पर धारण किया)
१०. पारिजात वृक्ष
११. पांचजन्य शंख
१२. शारंग धनुष
१३. भगवान धन्वंतरि (हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए)
१४. अमृत।

अमृत कलश निकलते ही दैत्यों ने उसे छीन लिया और आपस में लड़ने लगे। तब भगवान विष्णु ने अत्यंत रूपवती 'मोहिनी' का रूप धारण किया और अपनी मोहिनी माया से असुरों को मोहित कर समस्त अमृत देवताओं को पान करा दिया। राहु नामक दैत्य ने छल से सूर्य और चंद्रमा के बीच बैठकर अमृत पी लिया, जिसे मोहिनी रूपी प्रभु ने सुदर्शन चक्र से काट दिया, जो राहु-केतु बने। इस प्रकार देवताओं को अमरत्व प्राप्त हुआ और धर्म की पुनः स्थापना हुई।

कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य

समुद्र मंथन वस्तुतः मानव मन का आध्यात्मिक मंथन है। जब हम साधना करते हैं, तो पहले विष रूपी विकार (काम, क्रोध, लोभ) बाहर आते हैं, जिन्हें शिव-तत्व (वैराग्य) द्वारा ही शांत किया जा सकता है। उसके बाद ही सद्गुण रूपी रत्न और अमरत्व रूपी आनंद (अमृत) प्राप्त होता है।

समुद्र मंथन के १४ रत्न एवं प्रतीकात्मक अर्थ

पौराणिक ग्रंथों में समुद्र मंथन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि अंतःकरण के शुद्धिकरण का गहन आध्यात्मिक विज्ञान है।