Katha Sangrah Shiva महाभारत (वन पर्व - पातिव्रत्य महात्म्य)

सती सावित्री और सत्यवान की यमराज-विजय कथा — वट सावित्री व्रत और पतिव्रत धर्म

राजकुमारी सावित्री का सत्यवान को पति चुनना, नारद जी द्वारा अल्पायु की चेतावनी, वट वृक्ष के नीचे यमराज द्वारा प्राण हरण, सावित्री के धर्म संवाद से प्रसन्न होकर यमराज द्वारा तीनों वरदान और सत्यवान का पुनर्जीवन।

सती सावित्री और सत्यवान की यमराज-विजय कथा — वट सावित्री व्रत और पतिव्रत धर्म
Katha Sangrah महाभारत (वन पर्व - पातिव्रत्य महात्म्य)
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सती सावित्री और सत्यवान की यमराज-विजय कथा

मद्र देश के राजा अश्वपति ने संतान प्राप्ति के लिए देवी सावित्री की कठोर आराधना की, जिसके फलस्वरूप उनके घर एक अत्यंत रूपवती और तेजस्विनी कन्या ने जन्म लिया, जिसका नाम 'सावित्री' रखा गया।

जब सावित्री विवाह योग्य हुईं, तो राजा ने उन्हें स्वयं अपना वर चुनने की अनुमति दी। सावित्री ने तपोवन में जाकर शाल्व देश के अंधे राजा द्युमत्सेन के पुत्र 'सत्यवान' को देखा, जिनका राज्य शत्रुओं ने छीन लिया था और वे वन में निर्धनता में वास कर रहे थे। सत्यवान के शील, गुण और सेवा-भाव से प्रभावित होकर सावित्री ने उन्हें मन ही मन अपना पति स्वीकार कर लिया।

जब सावित्री ने राजदरबार में यह बात बताई, तो वहां उपस्थित देवर्षि नारद ने खेद प्रकट करते हुए कहा—"हे राजन! सत्यवान सर्वगुण संपन्न और धर्मात्मा तो हैं, किंतु उनमें एक अत्यंत भयंकर दोष है—उनकी आयु मात्र एक वर्ष शेष है। आज से ठीक बारह महीने बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी।"

राजा अश्वपति ने सावित्री को पुनर्विचार करने को कहा, किंतु सावित्री ने दृढ़ता से कहा—"पिताजी! कन्यादान केवल एक बार होता है। मैंने मन से सत्यवान का वरण कर लिया है, अब चाहे वे अल्पायु हों या दीर्घायु, वे ही मेरे पति हैं।"

सावित्री का विवाह सत्यवान से हुआ। वे राजसी सुख त्यागकर वन में सास-ससुर की सेवा करने लगीं। सत्यवान की मृत्यु का दिन जैसे-जैसे निकट आया, सावित्री ने तीन दिन का अखंड 'त्रिरात्र व्रत' (वट सावित्री व्रत) प्रारंभ किया।

नारद जी द्वारा बताए गए दिन सत्यवान वन में लकड़ियां काटने जाने लगे। सावित्री भी सास-ससुर की आज्ञा लेकर उनके साथ वन चली गईं। वन में एक विशाल वट वृक्ष (बरगद) के नीचे लकड़ी काटते समय सत्यवान के सिर में तीव्र पीड़ा होने लगी और वे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए।

तभी दक्षिण दिशा से साक्षात भैंसे पर सवार, रक्त-नेत्र और हाथ में पाश लिए यमराज प्रकट हुए। यमराज ने सत्यवान के शरीर से अंगूठे के आकार के सूक्ष्म जीवात्मा को अपने पाश में बांध लिया और दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।

सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगीं। यमराज ने मुड़कर कहा—"हे सावित्री! तुम पति का ऋण चुका चुकी हो, अब लौट जाओ।" सावित्री ने कहा—"हे धर्मराज! जहां मेरे पति जाएंगे, धर्म के अनुसार पत्नी का कर्तव्य है कि वह भी वहीं जाए। सत्पुरुषों का संग कभी निष्फल नहीं होता।"

सावित्री के धर्म और नीति से भरे वचनों को सुनकर यमराज अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा—"हे पतिव्रते! मैं तुम्हारे ज्ञान से संतुष्ट हूं। सत्यवान के प्राणों को छोड़कर तुम कोई भी वर मांग लो।"

सावित्री ने पहला वर मांगा—"मेरे अंधे सास-ससुर को नेत्र-ज्योति प्राप्त हो और उनका खोया हुआ राज्य पुनः मिल जाए।" यमराज ने 'तथास्तु' कहा और आगे बढ़े।

सावित्री फिर भी पीछे-पीछे चलती रहीं और धर्म की महिमा पर सारगर्भित संवाद करती रहीं। यमराज ने प्रसन्न होकर दूसरा वर दिया—"मेरे पिता के सौ पराक्रमी पुत्र हों।" यमराज ने इसे भी स्वीकार किया।

जब सावित्री तब भी नहीं लौटीं, तो यमराज ने कहा—"सत्यवान के प्राणों के अतिरिक्त तुम एक अंतिम वर मांग लो और तुरंत लौट जाओ।"

सावित्री ने चतुराई और धर्मानुकूल भाव से कहा—"हे धर्मराज! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे सत्यवान के औरस से सौ यशस्वी पुत्रों की माता होने का वरदान दीजिए!"

यमराज ने बिना विचार किए कह दिया—"एवमस्तु! (ऐसा ही हो)।"

वरदान देते ही सावित्री ने हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए कहा—"हे प्रभु! आप सत्यवादी और न्याय के स्वामी हैं। आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया है, किंतु पतिव्रता नारी अपने पति के बिना किसी अन्य से पुत्र उत्पन्न नहीं कर सकती। अतः अपने ही वरदान को सत्य करने के लिए आपको मेरे पति सत्यवान के प्राण लौटाने ही होंगे!"

यमराज सावित्री की अगाध पति-भक्ति, ज्ञान और चतुराई देखकर चकित रह गए। उन्होंने मुस्कुराते हुए सत्यवान के प्राणों को पाश से मुक्त कर दिया और कहा—"हे सावित्री! तुम्हारी धर्मनिष्ठा ने काल के विधान को भी बदल दिया।"

सावित्री वट वृक्ष के नीचे लौटीं। सत्यवान ऐसे जाग उठे जैसे कोई गहरी नींद से जागा हो। उनके सास-ससुर की आंखें ठीक हो गईं और राज्य पुनः मिल गया।

कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य

सती सावित्री की कथा सिखाती है कि बुद्धि, संयम और अटूट निष्ठा से मनुष्य असंभव को भी संभव बना सकता है। ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को वट सावित्री का व्रत इसी अखंड सौभाग्य और धर्म-निष्ठा के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

वट सावित्री व्रत का विधान एवं महात्म्य

वट (बरगद) का वृक्ष ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। सावित्री ने इसी वृक्ष के नीचे यमराज को पराजित किया था, इसलिए इस दिन सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष की परिक्रमा कर अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।