दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव के अपमान से व्यथित होकर माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए थे। इसके बाद सती का पुनर्जन्म गिरिराज हिमालय और महारानी मैना के घर कन्या के रूप में हुआ, जिनका नाम 'पार्वती' और 'उमा' रखा गया।
बाल्यावस्था में जब देवर्षि नारद हिमालय के राजभवन पहुंचे, तो उन्होंने पार्वती की हस्तरेखाएं देखकर भविष्यवाणी की—"हे शैलराज! तुम्हारी पुत्री सर्वगुण संपन्न है, किंतु इसका पति एक अवधूत, जटाधारी, नग्न रहने वाला, निष्काम और अकिंचन संन्यासी होगा। ऐसा वर केवल देवाधिदेव महादेव ही हैं।"
माता पार्वती ने बाल्यावस्था से ही मन, वचन और कर्म से भगवान शिव को अपना पति मान लिया। उस समय तारकासुर नामक दैत्य ने तीनों लोकों में भारी उत्पात मचा रखा था। उसे वरदान था कि उसका वध केवल शिव-पुत्र ही कर सकता है। किंतु भगवान शिव समाधि में लीन थे।
देवताओं ने शिव जी की समाधि भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। कामदेव ने वसंत ऋतु का सृजन कर काम-बाण चलाया, जिससे शिव जी की समाधि टूट गई। कुपित होकर महादेव ने अपना तीसरा नेत्र खोला और कामदेव क्षण भर में भस्म होकर राख हो गया। रति के विलाप करने पर प्रभु ने वरदान दिया कि द्वापर में कामदेव भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में पुनः शरीर धारण करेगा।
कामदेव के भस्म होने के बाद माता पार्वती ने समझा कि शिव जी को रूप या सौंदर्य से नहीं, अपितु कठोर तपस्या से ही प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने राजसी वस्त्र त्याग दिए और हिमालय के घोर वन में पंचाग्नि तपस्या प्रारंभ की। सहस्रों वर्षों तक अन्न-जल त्याग दिया और सूखे पत्ते खाकर तप किया। अंत में पत्ते खाना भी छोड़ दिया, जिससे उनका नाम 'अपर्णा' पड़ा।
भगवान शिव ने पार्वती की परीक्षा लेने के लिए सप्तर्षियों को भेजा। सप्तर्षियों ने शिव जी के अवगुण गिनाते हुए उन्हें विष्णु जी से विवाह का परामर्श दिया, किंतु पार्वती जी ने दृढ़ता से कहा—"कोटि जनम लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥" (चाहे करोड़ों जन्म लेने पड़ें, मैं शिव को ही वरूंगी अन्यथा कुंवारी ही रहूंगी)।
पार्वती के अनन्य प्रेम से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और विवाह का प्रस्ताव स्वीकार किया। विवाह के दिन भगवान शिव की अत्यंत विचित्र बारात सजी। एक ओर ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र आदि देवगण अपने दिव्य विमानों पर सवार थे, तो दूसरी ओर शिव जी के गण—भूत, प्रेत, पिशाच, डाकनी-शाकनी, भस्म रमे औघड़ और सर्पों की माला पहने नंदी पर सवार भोलेनाथ थे।
जब यह विचित्र बारात हिमालय की राजधानी पहुंची, तो बारात का भयानक रूप देखकर माता मैना भयभीत होकर मूर्छित हो गईं। तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने अपना अत्यंत मनोहारी 'चंद्रशेखर' रूप धारण किया, जो करोड़ों कामदेवों के सौंदर्य को लजाने वाला था।
माता मैना और राजा हिमालय आनंद से गद्गद हो गए। वैदिक रीति से भगवान शिव और माता पार्वती का पावन पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हुआ। संपूर्ण ब्रह्मांड में आनंद की वर्षा हुई और आगे चलकर उनके पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया।
Katha Sangrah
Shiva
शिव पुराण (रुद्र संहिता) एवं श्रीरामचरितमानस (बालकांड)
भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह — कामदेव भस्म और कैलास बारात
माता सती का पार्वती के रूप में गिरिराज हिमालय के घर पुनर्जन्म, नारद जी की भविष्यवाणी, कामदेव का भस्म होना, पंचाग्नि तपस्या, सप्तर्षि परीक्षा, और भूत-प्रेत व देवताओं की दिव्य बारात का आनंद।
Katha Sangrah
शिव पुराण (रुद्र संहिता) एवं श्रीरामचरितमानस (बालकांड)
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भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह
कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य
शिव-पार्वती का विवाह जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। काम और वासना को भस्म करके ही विशुद्ध प्रेम और तपस्या द्वारा परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है। बाह्य आडंबरों से परे आंतरिक निष्ठा ही सनातन प्रेम का आधार है।
महाशिवरात्रि एवं शिव-विवाह का आध्यात्मिक मर्म
भगवान शिव चेतना (पुरुष) हैं और माता पार्वती शक्ति (प्रकृति) हैं। जब तक प्रकृति और पुरुष का एकाकार नहीं होता, तब तक सृष्टि का संतुलन संभव नहीं है।