एक बार माता पार्वती कैलास पर्वत पर स्नान करने की तैयारी कर रही थीं। उन्होंने विचार किया कि नंदी आदि सभी गण भगवान शिव की आज्ञा का पालन करते हैं, उनका अपना कोई ऐसा आज्ञाकारी गण नहीं है जो उनके निजी द्वार की रक्षा कर सके। अतः माता ने अपने शरीर के उबटन (हल्दी और चंदन के लेप) से एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी बालक की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण फूंक दिए।
माता ने उस बालक को अपना पुत्र मानकर स्नेह दिया और आज्ञा दी—"बेटा! मैं स्नान करने जा रही हूं। जब तक मैं बाहर न आऊं, किसी को भी भीतर प्रवेश मत करने देना।" बालक हाथ में छड़ी लेकर गुफा के द्वार पर पहरा देने लगा।
थोड़ी देर बाद स्वयं देवाधिदेव महादेव वहां पहुंचे। बालक गणेश ने भगवान शिव को नहीं पहचाना और मार्ग रोकते हुए दृढ़तापूर्वक कहा—"रुकिए! मेरी माता की आज्ञा है कि कोई भीतर प्रवेश नहीं कर सकता।"
भगवान शिव के गणों ने बालक को समझाने का प्रयास किया, किंतु बालक अपने कर्तव्य पर अडिग रहा। गणों के साथ भीषण युद्ध हुआ जिसमें बालक ने सभी को परास्त कर दिया। अंततः क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से बालक का मस्तक धड़ से अलग कर दिया।
जब माता पार्वती स्नान कर बाहर आईं और अपने पुत्र को रक्त-रंजित भूमि पर पड़ा देखा, तो वे अत्यंत कुपित और शोकाकुल हो गईं। उनके क्रोध से संपूर्ण सृष्टि में हाहाकार मच गया। उन्होंने आदि-शक्ति का रौद्र रूप धारण कर लिया।
देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर भगवान शिव ने माता को शांत किया और वचन दिया कि बालक को पुनः जीवित किया जाएगा। शिव जी ने उत्तर दिशा में दूत भेजे और आज्ञा दी कि जो भी प्राणी पहले मिले और जिसकी माता अपनी पीठ उसकी ओर करके सोई हो, उसका सिर ले आओ। दूतों को एक हथिनी का नवजात शिशु (गजमुख) मिला।
भगवान शिव ने वह गज-मस्तक बालक के धड़ पर स्थापित कर उसमें प्राणों का संचार कर दिया। बालक जीवित हो उठा और उसने भगवान शिव और माता पार्वती के चरणों में प्रणाम किया। महादेव ने प्रसन्न होकर उसे अपने समस्त गणों का स्वामी घोषित करते हुए "गणपति" नाम दिया और वरदान दिया कि किसी भी शुभ कार्य में सबसे पहले गणेश की ही पूजा होगी।
इसके बाद एक अन्य प्रसंग में, जब गणेश जी और उनके बड़े भाई कार्तिकेय (स्कंद) में यह विवाद हुआ कि कौन श्रेष्ठ और बड़ा है, तो भगवान शिव ने एक परीक्षा रखी—"तुम दोनों में से जो भी संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा सबसे पहले करके लौटेगा, उसी का विवाह पहले होगा और वही अग्रपूज्य माना जाएगा।"
कार्तिकेय जी तुरंत अपने तीव्रगामी वाहन मयूर (मोर) पर सवार होकर संपूर्ण ब्रह्मांड और पृथ्वी की परिक्रमा के लिए उड़ चले। परंतु गणेश जी का शरीर स्थूल था और उनका वाहन मूषक (चूहा) था।
गणेश जी ने अपनी तीव्र बुद्धि का प्रयोग किया। उन्होंने शास्त्र सम्मत सत्य का स्मरण किया कि माता-पिता के चरणों में ही संपूर्ण तीर्थ और समस्त ब्रह्मांड समाहित है। उन्होंने शांत भाव से भगवान शिव और माता पार्वती को एक आसन पर बैठाया, उनके चरणों की सात बार श्रद्धापूर्वक परिक्रमा की और हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
जब कार्तिकेय संपूर्ण पृथ्वी का चक्कर लगाकर लौटे, तो उन्होंने गणेश जी को पहले से उपस्थित पाया। भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए निर्णय दिया—"पुत्र गणेश ने माता-पिता की परिक्रमा कर समस्त ब्रह्मांड की परिक्रमा का पुण्य फल प्राप्त कर लिया है। बुद्धि और विवेक में गणेश अद्वितीय हैं।" इस प्रकार गणेश जी समस्त देवताओं में प्रथम पूज्य बने।
Katha Sangrah
Ganesha
शिव पुराण एवं गणेश पुराण
भगवान श्री गणेश जन्म एवं पृथ्वी परिक्रमा कथा — प्रथम पूज्य बनने का रहस्य
माता पार्वती द्वारा उबटन से बालक गणेश का निर्माण, कैलास के द्वार पर पहरा, भगवान शिव के साथ युद्ध और गजमुख प्रत्यारोपण, कार्तिकेय के साथ ब्रह्मांड परिक्रमा की स्पर्धा और माता-पिता पूजन की अमर सीख।
Katha Sangrah
शिव पुराण एवं गणेश पुराण
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भगवान श्री गणेश जन्म एवं पृथ्वी परिक्रमा कथा
कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य
गणेश जी की कथा सिखाती है कि बुद्धि और विवेक के आगे शारीरिक गति या साधन कोई मायने नहीं रखते। माता-पिता की सेवा और उनका सम्मान ही संसार का सबसे बड़ा तीर्थ और परिक्रमा है। जो कर्तव्य के प्रति निष्ठावान है, ईश्वर उसे सर्वोच्च पद प्रदान करते हैं।
प्रथम पूज्य गणेश जी के अंगों का आध्यात्मिक संदेश
श्री गणेश का गजमुख विशाल बुद्धि और दूरदर्शिता का प्रतीक है, बड़े कान अधिक सुनने और कम बोलने की प्रेरणा देते हैं, और छोटा मुख व्यर्थ बातों से बचने का संकेत करता है।