Articles & Guides Krishna पद्म पुराण (एकादशी महात्म्य) एवं नारद पुराण

एकादशी व्रत के नियम, सम्पूर्ण महात्म्य एवं पारण विधि

वर्ष की सभी २४ एकादशियों का महत्त्व, चावल न खाने का वैज्ञानिक एवं पौराणिक कारण, दशमी से लेकर द्वादशी तक के आचार-नियम और हरिवासर में पारण की विधि।

एकादशी व्रत के नियम, सम्पूर्ण महात्म्य एवं पारण विधि
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एकादशी व्रत नियम एवं पारण विधि

सनातन धर्म में 'एकादशी' को सभी व्रतों का राजा (व्रतराज) कहा गया है। प्रत्येक मास में दो एकादशियां (कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष) होती हैं, इस प्रकार वर्ष में कुल २४ और मलमास (अधिकमास) में २६ एकादशियां होती हैं।

एकादशी व्रत का संकल्प दशमी तिथि की सायंकाल से ही प्रारंभ हो जाता है। एकादशी के दिन भगवान श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन किया जाता है।

एकादशी के प्रमुख नियम:
१. अन्न त्याग: एकादशी के दिन चावल (अक्षत), गेहूं, दाल आदि अन्न का पूर्ण त्याग किया जाता है। केवल फलाहार (दूध, फल, साबूदाना, कुट्टू) ग्रहण किया जाता है।
२. चावल न खाने का कारण: पौराणिक मान्यता के अनुसार महर्षि मेधा के अंगों से उत्पन्न जौ-चावल में पाप-पुरुष का वास होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से एकादशी के दिन शरीर में जल संतुलन बनाए रखने हेतु चावल का त्याग उत्तम है।
३. रात्रि जागरण: रात्रि में प्रभु नाम का संकीर्तन और गीता पाठ करना चाहिए।
४. द्वादशी पारण: अगले दिन द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व और 'हरिवासर' बीतने के बाद ही सात्विक भोजन से व्रत का पारण करना चाहिए।

कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य

एकादशी का व्रत शरीर के शोधन (डिटॉक्स) के साथ-साथ मन की एकाग्रता और मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है।

एकादशी व्रत का फल

पद्म पुराण में कहा गया है कि अश्वमेध यज्ञ और सहस्रों वर्षों की तपस्या से जो पुण्य फल मिलता है, वह केवल एक एकादशी के श्रद्धापूर्वक व्रत से प्राप्त हो जाता है।