महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, अपितु ब्रह्मांडीय चेतना के जागरण की परम पावन महारात्रि है। शिवपुराण के अनुसार, इसी रात्रि को देवाधिदेव महादेव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्राकट्य हुए थे और माता पार्वती के साथ उनका दिव्य पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हुआ था। इस रात्रि में सोने के बजाय चार प्रहर का रात्रि जागरण और प्रहर अनुसार अभिषेक करने से जीव समस्त बंधनों से मुक्त होकर शिवत्व को प्राप्त होता है।
१. चार प्रहरों का समय एवं अभिषेक विधान:
रात्रि के १२ घंटों को तीन-तीन घंटे के चार भागों में बांटा गया है, जिन्हें 'प्रहर' कहा जाता है:
(क) प्रथम प्रहर (सायं ६:०० से रात्रि ९:०० बजे):
* स्वरूप: भगवान ईशान स्वरूप।
* अभिषेक द्रव्य: कच्चा गाय का दूध।
* पुष्प व पत्र: कमल का फूल और बिल्वपत्र।
* विशिष्ट मंत्र: 'ॐ ह्रीं ईशानाय नमः' अथवा 'ॐ नमः शिवाय'।
* फल: धर्म की प्राप्ति और समस्त मानसिक विकारों का शमन।
(ख) द्वितीय प्रहर (रात्रि ९:०० से मध्यरात्रि १२:०० बजे):
* स्वरूप: भगवान अघोर स्वरूप।
* अभिषेक द्रव्य: गाय के दूध का ताजा दही।
* पुष्प व पत्र: धतूरा, श्वेत मंदार और बिल्वपत्र।
* विशिष्ट मंत्र: 'ॐ ह्रीं अघोराय नमः'।
* फल: अर्थ (धन-समृद्धि) की प्राप्ति और शत्रुओं पर विजय।
(ग) तृतीय प्रहर (मध्यरात्रि १२:०० से ३:०० बजे - निशीथ काल):
* स्वरूप: भगवान वामदेव स्वरूप (महाशिवरात्रि का सबसे दिव्य समय)।
* अभिषेक द्रव्य: शुद्ध देसी गाय का घी।
* पुष्प व पत्र: बेल का फल, भांग और भस्म।
* विशिष्ट मंत्र: 'ॐ ह्रीं वामदेवाय नमः'।
* फल: काम (समस्त पवित्र कामनाओं) की पूर्णता और आरोग्य।
(घ) चतुर्थ प्रहर (रात्रि ३:०० से प्रातः ६:०० बजे - ब्रह्म मुहूर्त):
* स्वरूप: भगवान सद्योजात स्वरूप।
* अभिषेक द्रव्य: शुद्ध शहद (मधु) एवं गन्ने का रस।
* पुष्प व पत्र: नीलकमल, शमी पत्र और अक्षत।
* विशिष्ट मंत्र: 'ॐ ह्रीं सद्योजाताय नमः'।
* फल: मोक्ष की प्राप्ति और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति।
२. रात्रि जागरण का नियम:
महाशिवरात्रि की रात्रि में रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर बैठना चाहिए। शिव पंचाक्षर स्तोत्र, रुद्राष्टकम, दारिद्र्य दहन स्तोत्र और महामृत्युंजय मंत्र का अखंड जप करते हुए रात्रि व्यतीत करनी चाहिए।
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