सनातन धर्म में देवाधिदेव महादेव के निराकार एवं साकार स्वरूप के प्रतीक शिवलिंग की पूजा को समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला और मोक्षदायक माना गया है। घर में शिवलिंग स्थापित करने और उनकी दैनिक पूजा करने के शास्त्रसम्मत नियम अत्यंत सरल परंतु संवेदनशील हैं।
१. शिवलिंग का आकार एवं चयन (शास्त्रोक्त नियम):
शिवपुराण के अनुसार घर में अंगूठे के पोर (लगभग ३ से ४ इंच) से बड़ा शिवलिंग नहीं रखना चाहिए। नर्मदेश्वर (नर्मदा नदी से प्राप्त प्राकृतिक बाणलिंग), स्फटिक लिंग, पारद लिंग अथवा मिट्टी से निर्मित पार्थिव शिवलिंग गृहस्थ आश्रम के लिए सर्वोत्तम माने गए हैं।
२. आवश्यक पूजन सामग्री:
* शुद्ध तांबे या पीतल का पात्र (जल अर्पण हेतु)।
* शुद्ध गंगाजल एवं स्वच्छ शीतल जल।
* कच्चा गाय का दूध, दही, देसी घी, शहद एवं गंगाजल (पंचामृत)।
* अक्षत (अखंडित बिना टूटे चावल)।
* सफेद चंदन, भस्म या त्रिपुंड हेतु अष्टगंध।
* तीन पत्तियों वाले अखंडित बिल्वपत्र (बेलपत्र), धतूरा, मदार (आक) के फूल।
* जनेऊ, कलावा, धूप, शुद्ध गाय के घी का दीपक।
* नैवेद्य (ऋतुफल, मिश्री या खीर)।
३. शिवलिंग अभिषेक की चरणबद्ध विधि:
(क) आचमन एवं पवित्रीकरण: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशासन पर बैठें। 'ॐ अपवित्रः पवित्रो वा...' मंत्र से स्वयं पर और पूजा सामग्री पर जल छिड़कें।
(ख) जलाभिषेक: सबसे पहले तांबे के लोटे से 'ॐ नमः शिवाय' या 'महामृत्युंजय मंत्र' का निरंतर जप करते हुए पतली जलधारा से शिवलिंग पर जल अर्पित करें।
(ग) पंचामृत स्नान: क्रम से दूध, दही, घी, शहद और शर्करा से अभिषेक करें। प्रत्येक द्रव्य के बाद शुद्ध गंगाजल से पुनः स्नान कराएं।
(घ) चंदन व त्रिपुंड: शिवलिंग पर अनामिका उंगली से चंदन का त्रिपुंड बनाएं।
(ङ) बिल्वपत्र अर्पण नियम: बिल्वपत्र की चिकनी सतह नीचे (शिवलिंग की ओर) होनी चाहिए और डंठल का भाग अपनी ओर या जलहरी की ओर रखें। बेलपत्र पर चंदन से 'ॐ' या 'राम' लिखकर अर्पण करने से सहस्र गुना फल मिलता है।
(च) धतूरा एवं भस्म: भगवान आशुतोष को भस्म अतिप्रिय है। धतूरा, सफेद मंदार पुष्प और भांग अर्पित करें।
४. शिवलिंग पूजा में अत्यंत महत्वपूर्ण निषेध (क्या न चढ़ाएं):
* तुलसी दल: पौराणिक मान्यता अनुसार भगवान शिव ने शंखचूड़ का वध किया था, जिसकी पत्नी तुलसी (वृंदा) थीं। इसलिए शिवलिंग पर तुलसी पत्र नहीं चढ़ाया जाता।
* केतकी एवं चंपा का फूल: शिवपुराण में वर्णित है कि केतकी ने ब्रह्मा जी के असत्य में साथ दिया था, अतः शिवजी ने इसे शाप देकर अपनी पूजा से बहिष्कृत कर दिया।
* सिंदूर, कुमकुम व रोली: शिवजी वैरागी हैं और सिंदूर सौभाग्य/सौंदर्य का प्रतीक है। केवल माता पार्वती को कुमकुम अर्पित करें।
* शंख से जल: शंखचूड़ के वध के कारण शिवलिंग पर शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता।
५. शिवलिंग की परिक्रमा का नियम (अर्ध-प्रदक्षिणा):
शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा नहीं की जाती। हमेशा जलहरी (निर्मली जहां से अभिषेक का जल प्रवाहित होता है) तक जाकर वापस मुड़ जाना चाहिए। जलहरी को लांघना शास्त्रों में वर्जित माना गया है क्योंकि उसमें चंडेश्वर का वास होता है।
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शिवलिंग कोई साधारण पत्थर या पाषाण नहीं, बल्कि आदि और अंत से रहित परमब्रह्म के ज्योतिर्मय स्तंभ का प्रतीक है। अभिषेक के समय लगातार गिरने वाली जलधारा हमारे चंचल मन को शांत कर एक बिंदु पर स्थिर करने का आध्यात्मिक विज्ञान है। जब हम बेलपत्र (जिसकी तीन पत्तियां सत्व, रज और तम तीनों गुणों तथा भूत, वर्तमान, भविष्य की प्रतीक हैं) अर्पित करते हैं, तो वास्तव में हम अपने तीनों गुणों और अहंकार को शिव के चरणों में समर्पित कर पूर्ण शांति प्राप्त करते हैं।