समस्त वेदों, उपनिषदों और मंत्रों का मूल उद्गम 'ॐ' (प्रणव) है। कठोपनिषद में यमराज नचिकेता को बताते हैं कि जिस परम पद की चर्चा सब वेद करते हैं, वह संक्षेप में 'ॐ' ही है। वहीं ऋग्वेद का 'गायत्री महामंत्र' (सावित्री मंत्र) बुद्धि को सत्य के प्रकाश से आलोकित करने वाला सर्वोच्च महामंत्र है।
१. 'ॐ' (प्रणव) का त्रिविध रहस्य:
माण्डूक्य उपनिषद के अनुसार ॐ तीन ध्वनियों और एक मौन से मिलकर बना है:
* 'अ' (A): जाग्रत अवस्था और सृष्टि के सगुण रूप का प्रतीक (नाभि केंद्र से ध्वनि)।
* 'उ' (U): स्वप्न अवस्था और संरक्षण/पालन का प्रतीक (हृदय व कंठ केंद्र से ध्वनि)।
* 'म' (M): सुषुप्ति (गहरी निद्रा) और लय/संहार का प्रतीक (मस्तिष्क और नासिका में गूंज)।
* 'मौन' (तुरीय): ॐ के उच्चारण के बाद का परम सन्नाटा, जो अद्वैत ब्रह्म का साक्षात्कार कराता है।
२. ॐ उच्चारण की वैज्ञानिक पद्धति:
पद्मासन या सिद्धासन में मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) को सीधा करके बैठें। आंखें बंद करें और गहरी श्वास लें। श्वास छोड़ते हुए धीमी, गंभीर ध्वनि में ॐ का उच्चारण करें। आधुनिक न्यूरोसाइंस के शोध दर्शाते हैं कि ॐ के निरंतर गुंजन से मस्तिष्क में अल्फा तरंगें (Alpha Waves) सक्रिय होती हैं, तनाव हार्मोन कोर्टिसोल में कमी आती है और वेगस नर्व (Vagus Nerve) उत्तेजित होकर हृदय गति को शांत करती है।
३. गायत्री महामंत्र का स्वरूप एवं जप विधि:
'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥'
* भावार्थ: उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें, जो परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।
* २४ अक्षरों की शक्ति: गायत्री मंत्र के २४ अक्षर मानव शरीर की २४ प्रमुख ग्रंथियों और चक्रों को जागृत करते हैं।
* जप के तीन प्रकार:
१. वाचिक (बोलकर): आरंभिक साधकों के लिए।
२. उपांशु (होंठ हिलें पर आवाज केवल स्वयं सुने): मध्यम साधकों के लिए।
३. मानसिक (बिना होंठ हिलाए केवल मन में): सर्वश्रेष्ठ कोटि का जप, जिसका फल अनंत गुना होता है।
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कथा से सीख एवं आध्यात्मिक रहस्य
गायत्री मंत्र कोई प्रार्थना मात्र नहीं, यह चेतना को सर्वोच्च स्तर तक उठाने की चाबी है। जब बुद्धि सन्मार्ग की ओर प्रेरित होती है, तो मनुष्य के सभी निर्णय सही होते हैं, जिससे जीवन में सुख, शांति और मोक्ष की प्राप्ति स्वतः हो जाती है।
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