कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी एवं द्वादशी तिथि को भगवान श्रीहरि विष्णु के शालिग्राम स्वरूप का विवाह जगज्जननी भगवती तुलसी (वृंदा) के साथ अत्यंत धूमधाम से किया जाता है। तुलसी विवाह के साथ ही सनातन धर्म में चातुर्मास की समाप्ति होती है और सभी प्रकार के मांगलिक कार्य (विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश) प्रारंभ हो जाते हैं।
१. तुलसी विवाह का पौराणिक पृष्ठभूमि:
जालंधर दैत्य की पत्नी वृंदा अत्यंत पतिव्रता थीं। भगवान विष्णु ने देवताओं की रक्षा हेतु वृंदा के पातिव्रत्य का भेदन किया, जिससे क्रुद्ध होकर वृंदा ने श्रीहरि को पाषाण (पत्थर) होने का शाप दिया। भगवान ने शाप को स्वीकार करते हुए शालिग्राम रूप धारण किया और वृंदा के सतीत्व का सम्मान करते हुए वरदान दिया कि कलियुग में मेरी पूजा तुलसी पत्र के बिना कभी पूर्ण नहीं होगी और प्रतिवर्ष मेरा विवाह तुम्हारे साथ संपन्न होगा।
२. पूजन सामग्री एवं तैयारी:
* तुलसी का हरा-भरा गमला (जिसे गेरू और चूने से सजाया गया हो)।
* भगवान शालिग्राम जी की पावन शिला।
* तुलसी माता हेतु लाल चुनरी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां, मेंहदी व पूर्ण सोलह श्रृंगार।
* शालिग्राम जी हेतु पीला पीतांबर वस्त्र और जनेऊ।
* गन्ने (ईख) का मंडप (४ गन्नों से बनाया गया)।
* आंवला, बेर, सिंघाड़ा, सीताफल और मौसमी फल।
* रोली, अक्षत, धूप, दीप, कर्पूर, कलावा (मौली) और हल्दी।
३. विवाह की संपूर्ण अनुष्ठान विधि:
(क) मंडप निर्माण: तुलसी के गमले के चारों ओर गन्ने खड़े करके सुंदर मंडप बनाएं और रंगोली सजाएं।
(ख) शालिग्राम स्थापना: चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर शालिग्राम जी को स्थापित करें और गंगाजल से स्नान कराएं।
(ग) श्रृंगार: तुलसी जी को लाल चुनरी ओढ़ाएं, मांग में सिंदूर लगाएं और समस्त सुहाग सामग्री अर्पित करें।
(घ) हल्दी लेपन: भगवान शालिग्राम और तुलसी जी को हल्दी की गांठ या पिसी हल्दी का लेप लगाएं।
(ङ) गठबंधन: पीले वस्त्र या कलावा से शालिग्राम जी और तुलसी जी का मंगल गठबंधन करें।
(च) सात फेरे: शालिग्राम जी की चौकी को हाथों में उठाकर तुलसी के गमले की सात परिक्रमा (फेरे) कराएं।
(छ) कन्यादान संकल्प: परिवार के मुखिया अथवा दंपति हाथ में जल, तिल और कुश लेकर तुलसी जी का कन्यादान करें। शास्त्रों के अनुसार तुलसी विवाह कराने वाले को सहस्र कन्यादान के समान पुण्य प्राप्त होता है।
(ज) भोग व आरती: खीर और पूड़ी का भोग लगाएं और 'जय तुलसी माता' की सपरिवार आरती करें।
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तुलसी का पौधा मात्र एक वनस्पति नहीं, अपितु पृथ्वी पर प्रत्यक्ष संजीवनी और सात्विकता का केंद्र है। तुलसी विवाह गृहस्थ जीवन में पति-पत्नी के मध्य अटूट निष्ठा, पवित्रता और दैवीय समर्पण की प्रेरणा देता है। वैज्ञानिक रूप से भी कार्तिक मास में तुलसी के निकट दीप जलाने से पर्यावरण और श्वसन तंत्र शुद्ध होता है।
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